आई पुजारिन द्वार तुम्हारे
लेके श्रद्धा सुमन अनेकों
देख रहे हो क्यों तुम ऐसे
क्या उसको स्वीकार करोगे
मन में कोलाहल इतना है
चलना भी दुश्वार हो गया
बहक गए हैं कदम अचानक
क्या तुम उसके साथ चलोगे
आशा के कुछ दीप सजाए
पूजा करने वह आई है
क्या स्थान मिलेगा उसको
कोने में दिल के आँगन के
तुम्हें बिठाया पलकों पर
नज़र से अपनी गिरा न देना
बहुत उमंगें छिपी है दिल में
तुमको कुछ आभास नहीं है
मुरझा जाएँगे सुमन ख़ुशी के
दिल के उसके दुखी न देना
उठो ज़रा झाँको नयनों में
कितना प्यार छिपा है इनमें
अपनी सुध-बुध खो बैठी है
है अधीर मन धैर्य कहाँ है
थकी हुई सी बैठ गई है
राह तुम्हारी देख-देख कर
द्वार तुम्हारे आ बैठी है
माँग रही है प्यार तुम्हारा
देख रही है कातर नयनों से
सुधा प्रेम की कब बरसेगी
कब भीगेंगे नयन तुम्हारे
बिखर गए सब पुष्प हाथ से
माला में जो पिरोये हुए थे
गिरे तुम्हारे पैरों में जब
तब भी तुम कुछ समझ न पाए
कितने श्रद्धा भाव छिपे थे
कितना था अनुराग भरा
कितने बरबस अश्रु वहे थे
वेदना उर की कहने न पाए
मन का बोझ हो गया हल्का
मन की बात कुछ कह न पाई
देख रही आज भी तुमको
पूजा थाल सजाए कर में
आई पुजारिन द्वार तुम्हारे
क्या उसको स्वीकार करोगे ।
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