author_devasur
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"चेहरे मायने नहीं रखते... रातें रखती हैं।
हर सुबह मैं पत्नी थी... हर रात कोई और।"
उसका नाम अवनी है।
शहर के एक शांत कोने में बसा उसका घर, और उस घर की दीवारों के पीछे एक ऐसी खामोशी... जिसमें शब्द नहीं, सिर्फ़ इंतज़ार बसता है।
पति बिज़नेस टूर पर है - महीनों से।
और अवनी ने एक आदत बना ली है।
हर शाम, घर के काम निबटाकर वो सजती है - जैसे कोई वादा निभाने जा रही हो।
रेशमी साड़ी, हल्का काजल, होंठों पर गुलाबी रंग... और मन में एक अजीब-सी तड़प।
वो अपनी कार उठाकर निकलती है - उसी होटल की तरफ़,
"उदयायन पैलेस", जहाँ हर रात उसका कोई इंतज़ार करता है।
पर वो नहीं जानती कौन।
वो चेहरा नहीं देखती।
न ही देखना चाहती है।
हर रात एक नया अहसास होता है -
हर रात कोई और...
और फिर सुबह वही घर, वही ज़िंदगी, वही चुप्पी।
पर क्यों?
क्या ये अकेलापन है?
या प्यार की भूख?
या कोई खेल... जो वो खुद भी नहीं समझती?
अवनी की अपनी ही ज़ुबानी सु