Kankuro123
सत्यार्थ को लोग घमंडी कहते थे। वह सच नहीं था। सच यह था कि वह दुनिया की आवाज़ों से बाहर था।डिपार्टमेंट का सबसे बड़ा प्रोडिजी। दिमाग ऐसा कि प्रोफेसर भी रुककर सुनें। पर उसकी अपनी दुनिया, खामोश।
नील शोर था। बेचैन, जिद्दी, ध्यान चाहने वाला। वह सत्यार्थ की तरफ खिंचता गया, पहले प्रशंसा में, फिर पागलपन में। उसे लगा वह उसे नज़रअंदाज़ कर रहा है। उसे क्या पता था, वह जितना ज़ोर से चिल्ला रहा था, सत्यार्थ उतना ही कुछ नहीं सुन पा रहा था।
जिस दिन सच सामने आया, नील की आवाज़ पहली बार टूट गई। अब सवाल यह नहीं है कि कौन किसे समझेगा।
सवाल यह है...
क्या मोहब्बत उस खामोशी तक पहुँच सकती है
जहाँ शब्द कभी पहुँचे ही नहीं?
क्या नील पहुंच पाएगा सत्यार्थ की खामोशी के...उस पार?