एक साधारण-सी बातचीत से आरम्भ हुई यह कथा कब मन के किसी शांत कोने में अपना स्थान बना लेती है- इसका आभास ही नहीं होता। कुछ संबंधों को किसी नाम की आवश्यकता नहीं होती; वे धीरे-धीरे शब्दों में आकार लेते हैं, मौन में अर्थ पाते हैं और स्मृतियों में अपना घर बना लेते हैं। यह उसी यात्रा का वृत्तांत है- कुछ कही हुई बातों का, कुछ अनकहे भावों का, कुछ ठहरे हुए क्षणों का और उस अधूरे वाक्य का जिसे अभी पूरा होना शेष है।
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