क्रोध भी प्यारा लगा अवरोध भी प्यारा लगा, इक रूट को तरसा जिया हर रूट हत्यारा लगा, नारी ही वह जात जिसको लोग अबला कह गये, इनकी हस्ती को ना समझे नासमझ ही रह गये, इनको कस्ती जो ना समझा छोर मजधारा लगा! इनकी हिकमत बा वफा से बेवफा हो गया, इनकी ताकत खोके ओ अपनी ही ताकत खो गया, इनको 1+1=२ ही समझा ना उन्हें ग्यारा लगा! अपने कानो से सुनी झरनों से इनकी दास्तान, जिस तरफ ही जाइए मिलते हैं इनके ही निसान, दूर से गिरता हुआ पाहन पे जल धारा लगा! ये नहीं तो कुछ नहीं, ना है जमीं ना आसमान, इन बिना सूना यहाँ सूना वहाँ सूना जहान, इन बिना सूनी है मंदिर सूना गुरुद्वारा लगा, हाल दिल कहते रहे अबना कहेंगे बार-बार, कब समा रंगीन होगा कर रहे हम इन्तेजार, अब समझ भी जाइए क्या 'नाज़' को न्यारा लगा!
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