कहते हैं। ख़ामोशी तन्हा इबादत है। ख़ामोशी सुकून हैं। लेकिन क्या हो जब एक इंसान अपनी जिंदगी में ख़ामोशी को इस क़दर शामिल कर लें, की वहां सिर्फ़ उस के धड़कते दिल का शोर हो। अर्श सिंघानिया , एक पावरफुल बिजनेसमैन। जो निहायती चिड़चिड़ा, गुस्सैल और अकड़ू हैं। जिसके कदम रखते ही उस जगह शांति और खौफ छा जाता हैं। जितना वह गुस्सैल है। उतनी ही मासूम है , हमारी महर ! महर मेहरा। चंचल, नटखट और ज़िद्दी। हमेशा सब को हंसाती रहती हैं। पर कहते है न, जिंदगी कब कैसे पलट जाएं , क्या पता। ठीक उसी तरह महर की जिंदगी, उसे न भरने वाले जख्म देकर चली जाती हैं। और इसी बीच उसकी मुलाक़ात होती है अर्श से । वो कब उसके साथ एक अटूट बंधन में बंध जाती है । उसे पता ही नहीं चलता । वहीं अर्श , उसे एक वादे के लिए करनी पड़ती है महर से शादी । लेकिन इनका अतीत कुछ और ही था । और किस्मत को कुछ और मंजू
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