"गर्म दोपहर का एक आम सा सफर, बस की पाँचवीं लाइन वाली सीट और भाई के साथ घर वापसी। सब कुछ सामान्य था, जब तक कि टिकट के पाँच रुपयों के लिए एक बहस शुरू नहीं हुई। लेकिन उस शोर के बीच एक नन्ही सी आवाज़ ने सबको मुस्कुराने पर मजबूर कर दिया। यह कहानी है उस छोटे से सफर की, जहाँ एक बच्ची की दरियादिली ने सिखाया कि इंसानियत आज भी ज़िंदा है। मेरी डायरी से एक और अनकहा किस्सा..."
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