हर ज़िंदगी में एक ऐसा लम्हा आता है, जब सब कुछ बदलने लगता है। "कुछ तो ख़ास होने वाला है..!" उसी अनकहे मोड़ की दास्तान है-जहाँ हर किरदार अपनी परछाइयों से भाग रहा है, और किसी अदृश्य ताक़त से टकराने वाला है। एक मुलाक़ात जो इत्तेफ़ाक़ लगती है, पर असल में क़िस्मत का लिखा सच है। एक राज़ जो सालों से छुपा है, पर अब सामने आने के लिए बेचैन है। और कुछ रिश्ते जो समय की आँधी में बिखरेंगे या शायद और मज़बूत हो जाएँगे। हर पन्ना पढ़ते हुए लगेगा कि जैसे कैमरा धीरे-धीरे ज़ूम कर रहा हो-कभी दिल की धड़कन पर, कभी एक रहस्यमयी ख़ामोशी पर। क्या वो पल खुशी लाएगा या किसी सच्चाई का दर्द? क्या इंतज़ार का ये सफ़र किसी नई शुरुआत तक पहुँचेगा-या किसी अधूरी दास्तान पर खत्म होगा? यह सिर्फ़ कहानी नहीं, एक सिनेमाई अनुभव है। एक अहसास, जो कहता है-ज़िंदगी के अगले मोड़ पर सचमुच कुछ तो ख़ास होने वाला है...
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