ज़िन्दगी एक कहानी है और हर कहानी का एक कहानीकार होता है। जैसे-जैसे ज़िन्दगी क कहानी के पन्ने पलटते रहते है, वैसे-वैसे हमें लगने लगता है कि कोई है जो हमें देखते-परखते हुए हमारी कहानी लिख रहा। जिसकी पैनी नज़र हम पर है। कोई है, जिससे हमारी खुशियाँ बर्दाश्त नहीं होती है। कोई है, जो हमें हमारे प्यार से दूर कर रहा है। कोई है, जो में नाउम्मीदी से घुटनों पर पड़ा देखकर खुद को ताक़तवर महसूस कर रहा है। बारहवीं शताब्दी में रुक्मिणी, कृष्ण चंद्र, देवेन्द्र, जगदीश, रसिकानंद, बटुकेश्वर व स्वरागिनी को भी ऐसा ही लगता था। उन सबकी ज़िन्दगी में एक ऐसा वक्त भी आया जब उनकी कहानी का कहानीकार उनके सामने आ खड़ा हुआ। वे सब हैरान थे उसकी पहचान देखकर, क्योंकि वह भगवान नहीं था। फिर कौन था वो? यह जानने के लिए आपको प्यार, दोस्तीं व अन्य भावनाओं की इस नदी में एक बार डुबकी लगानी होगी।
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