मंगलपुर गाँव में चंपकलाल 'चंपू' नाम का दुकानदार रहता है - जिसकी दुकान में सड़ी रस्सी से लेकर हवाई चप्पल तक सब मिलता है। पर एक दिन उसकी नारंगी चप्पलें गायब हो जाती हैं - वही चप्पलें जिन्हें वह अपनी किस्मत और बुद्धि का रहस्य मानता था। अब चंपकलाल निकल पड़ा है एक विचित्र यात्रा पर - जहाँ उसे मिलेगा आलसी तहसीलदार, बोलती बकरी, सरकारी बेसमेंट और शायद... उसकी "चमत्कारी" चप्पलें भी! यह कहानी गाँव, व्यंग्य और सरकारी अफ़सरशाही के बीच छिप े हास्य की है। हँसी, व्यंग्य और मिट्टी की महक से भरी - "चंपकलाल की चमत्कारी चप्पल" एक ऐसा सफ़र है जहाँ हर कदम पर चप्पल से ज़्यादा कहानी चमकती है।
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