बाते आज कल बाते नही हैं! एक अलग ही धंधा चला रहे है लोग | एक व्यापार जिसका उदेश्य क्या है ये बेचारा वो कभी नहीं समझ पाएगा जिसका हृदय इतना कोमल है की सिर्फ बाते खत्म होने के डर से ही उसकी साँसे थमने लगती थी | विकारी तो दोनों है एक लोभ का स्वामी है तो एक मोह का दास बना बैठा है| फ़िर जब व्यापारी पे सारी बाते खतम हो जाती हैं तो बचता है बहिष्कार | त्याग दो अब तो समय भी कट गया और जो भी ज्ञान था वो भी बट गया, और दूसरा व्यक्ति जो कभी मोल भाव जानता ही नही था | आज नाप तोल के उसके होंठ हिलने का इंतज़ार करता है और कहता चलो कुछ नही तो यही सुना दो की " तुम फायदे मे रहे के घाटे मे " !
अचानक से अश्रु को पोछकर कुछ सोच लेते है चलो ये व्यापार अब हम भी करेंगे और कुछ आशुओं को तबतक बहने देते है! जब तक वो उन्हे उस कोने तक गीला ना कर दे जिस कोने यादे बसी हैं | किसकी यादे? किसी एक की थोड़ी होती हैं यादे, जिनकी यादे दबा ली नये पलो को जीते वक्त वो तो मानो हृदय चीर कर निकलती हैं शायद तभी पीड़ा ज्यादा होती है | हाँ चलो मैं तुम्हें भुला दू पर डर तो ये है पता नही किस दिन ये हृदय फिर छलनी हो जाए और तुम्हारी स्मृत्याँ इतना तोड़ कर निकले की जो अगला व्यापारी भी इंकार कर दे की इस टूटी हुई चीज़ का जिसकी न जाने क्यो साँसे थमी हुई करेगा वो व्यापार नही करेगा!!
एक वाक्य था जो मैंने बिना महसूस किये लिखा था आज उसे इस हद तक महसूस कर लिया है की अब से ऐसा कुछ नही लिखूँगी!
"जाने कब खत्म होगा ये इंतज़ार पर अगर ये इंतज़ार खत्म हो गया तो" -
हर एक याद के साथ मैं एक इसी चीज भी ढफन कर देती हुँ जो उसी की तरह कभी मुझे सुकून देती थी!
एक आख़िरी कविता फ़िर इस कलम को भी आराम देते है कितना थक गयी है बेचारी!!
देखो मैं झूठी हुँ, क्या क्या केहती थी अब क्या कहती हु
कहीं तो रहती थी हाँ मुझे याद है पर अब कहा रहती हूँ!
मैं साहस करती हु युध का पर विरह तक न सहती हूँ!
मैं भ्रम हुँ तुम बचो मुझसे, मैं वो हवा जो न बहती हूँ!
"क्यो पीड़ा का सार मिले पीड़ा सैदेव से ही पीड़ित है
तुम सार तुम्हारा खोजो ना,
अब थक गयी हो बैठ जाओ , विकलंगो का भी जीवन कट ता है!
आखिर मे आप भी मेरी तरह अपनी हिस्से की रुकी हुई साँसे भरे नही तो इसका भी व्यापार हो जाएगा!
इस नाम के खोने का वक़्त आ गया हैं! कोई पूछे तो बोलना होगा कोई!
~ वायुसी