लट बिखराए, पलक झुकाए हाथों में भोजन का थाल लिए,
मौन खड़ी वो नित स्थल पर चेहरे पर चमकता चांद लिए।
मधुरिम आभा, श्वेत वस्त्र, गालों पे तिल का दाग़ लिए,
कानों की बलखाती बाली, नागिन से घुघराले बाल लिए।
झील सी गहरी कोमल आंखे उमड़ता हुआ सैलाब लिए,
मंद मंद मुस्का रही थी होंठो पे खिलता गुलाब लिए।
खमोश लब झुकी पलकें विशाल हिमालय सा ललाट लिए,
दिल में हलचल मचा रही थी,होंठो पे कितने सवाल लिए।
डालियों सी लंबी गर्दन,मीठी सी बहकाती मुस्कान लिए,
शर्म हया से छुप जाती है धरा पे सारा आसमान लिए।
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Ankahe Alfaaz...
Puisiजो बातें आँसुओ से बयां नहीं हो पाती, अल्फ़ाज़ का रूप ले लेती है! Just some random poetries by me.
