हिंदी

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है हिंद की मर्यादा हिंदी,
है नाज़ हमें हिंद की हिंदी पर।
शब्द हैं जिसके मोतियों-से--
ऐसा श्रृंगार नहीं किसी भी और सरजमीं पर।

भावनाओं को दर्शाना
शब्दों के जाल को बुनना
हृदय को खोल कर कागज़ पर रख देना
अंतर-मन को एक नई आवाज देना।

यह सब हिंदी से ही तो मुमकिन है-
स्वरों को नवीन तान दे पाना
व्यंजनों को नई परिभाषा देना
जो बात हिंदी में है वो किसी और में नहीं ही तो है।

सुर-तुलसी, संत कबीर, रसखान और मीराबाई
छंदों के बंधनों में बंधकर रचनाएँ इन्होंने अप्रतिम बनाई।
निराला-दिनकर, पंत-सर्वेश्वर, चौहान और महादेवी
बंदिशों से मुक्त होकर एक नवयुग की इन्होंने आस जगाई।

ऐसी अद्वितीय है हमारे हिंद की हिंदी,
दूर-दूर तक कोई करीब भी नहीं।
धरोहर है यह हमारे स्वर्णिम विरासत की,
है हिंद की अक्षुण्ण मर्यादा हिंदी ।

लक्ष्य

चित्र स्त्रोत: Mi calendar

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