Khushi

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मुंबई से दूर, मांडवा के समुद्र किनारे:

चमचमाती चाँदनी समुद्र की लहरों पर ऐसे बिखर रही थी, जैसे किसी डरावनी परियों की कहानी का पर्दा खुलने वाला हो। किनारे के पास एक पुरानी जेटी की लकड़ियाँ चरमराती हुई आवाज़ें कर रही थीं, और उस वीरान जगह पर केवल समंदर की गूँज और मौत का सन्नाटा था। वहीं, एक आदमी ज़मीन पर पड़ा था। उसका नाम राघव मिश्रा था, जो एक जिद्दी और मशहूर पत्रकार था। लेकिन इस वक़्त, उसका सारा जिद और हिम्मत गायब थी।

राघव के हाथ और पैर मोटी रस्सियों से ऐसे बंधे थे, जैसे वो एक शिकार हो और शिकारी उसे अभी-अभी जाल में फँसाकर लाए हों। उसकी छाती पर एक बड़ा पत्थर बंधा था, और उसके पसीने से तरबतर चेहरे पर मौत का खौफ साफ झलक रहा था। सामने खड़े दो गुंडे उसे तिरछी मुस्कान के साथ देख रहे थे।

पहला गुंडा (बबलू): (गंभीर लहजे में)
"सुन राजू, मुझे अब भी लगता है कि ये गलत है। भाई ने तो बस इसे डराने को कहा था। अगर भाई को पता चल गया कि हमने इसे मार डाला, तो वो हमारा हाल भी इसी पत्रकार जैसा कर देगा!"

दूसरा गुंडा (राजू): (माचिस की तिल्ली जलाते हुए, लापरवाही से)
"अरे डरपोक, भाई को कौन बताएगा? और वैसे भी, जब इसकी लाश समंदर के नीचे मछलियों का खाना बन जाएगी, तो कोई सबूत भी तो नहीं बचेगा। अब ज़्यादा दिमाग मत लगा। पत्थर कस और इसे समंदर में फेंक।"

राघव की आवाज़ तेज़ हो गई। उसकी हालत ऐसी थी जैसे किसी ने उसके गले में फंदा डाल दिया हो।

राघव: (गिड़गिड़ाते हुए)
"भाई... भाई! मैं मानता हूँ मुझसे गलती हो गई। लेकिन मुझे छोड़ दो। मेरे पास जो सबूत हैं, सब तुम ले लो। मैं कसम खाता हूँ, अब कभी तुम्हारे माफिया के खिलाफ एक लफ्ज़ भी नहीं लिखूँगा। प्लीज... मुझे जाने दो।"

लेकिन दोनों गुंडों पर उसकी बातें असर नहीं कर रही थीं। बबलू और राजू हँस रहे थे, मानो किसी कॉमेडी शो का मज़ाकिया सीन देख रहे हों।

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